पेड़

पेड़ पर लगे हुए एक फ़ूल की कामना है,

“अगर हवाओं के साथ बहने के लिए थोड़ा ऊँचा हो जाऊँ”

ख़्याल रहना चाहिए उसको इतना ,

पेड़ से टूटकर उड़ तो सकता है पर जी नहीं सकता ।

तो क्या ऊँचा उड़ने की ख़्वाहिश की कीमत ज़िन्दगी ही है ?

ग़ुरूर को दरकिनार कर अगर वो सोच सके इतना ,

“क्यों न पेड़ को ऊँचा कर फिर लहरा उठूँ मैं”

ज़िन्दगी बच जाएगी, उसकी भी और पेड़ की भी ,

क्योंकि उस पेड़ को मुरझाते देर नहीं लगती ,

जिसका इकलौता फ़ूल उससे जुदा हो चले ।

पर फ़ूल को इतने ख़्याल आते कहाँ हैं ,

सोचना तो स्थिर पेड़ को आता है ,

फ़ूल तो बस पेड़ से पोषित होकर ख़ुद महकना जानता है ।